Saturday, May 10, 2008

नेकी कर दरिया में डाल

क्या कभी आपने अपने पड़ोसी की मदद की है। अगर हां, तो आगे से मत कीजिएगा. चौंक गये होंगे कि कल एक अनजान महिला की मदद ना करने पाने पर परेशान होने वाला शख्स आज अचानक इतना उद्वेलित क्यों है. तो आइये आपको एक सच्ची कहानी सुनाता हूं. लगभग ५२ साल पहले की बात है, मेरे पिता श्री राम प्रसाद शुक्ल आठवीं की पढ़ायी के बाद दिल्ली कमाने चले गये. घर में उनके पिताजी (मेरे दादाजी, बुआ और दादी थीं). जमींदारी खत्म हो गयी थी और घर में कमानेवाला कोई नहीं था. दिल्ली में उन्हें शायद ३० रुपये महीने या १६ रुपये (पिताजी से पूछ कर बताऊंगा)की नौकरी मिल गयी. दिन भर काम करते और रात में पढ़ाई. इस तरह १०वीं तक पढ़ भी लिया. हालांकि अनुभव ने उन्हें इतना सिखाया है कि जिस कंपनी में काम करते हैं, उसका सीए भी उनसे घबराता है. हां, तो पिताजी धीरे-धीरे प्रगति करते गये और हम पांच भाई-बहनों को पढ़ाया-लिखाया और किसी काबिल बनाया. इस बीच उन्होंने गांव और रिश्तेदारी के लगभग ५० लोगों को काम दिलाया. इन्हीं लोगों में एक हैं राममणि शुक्ल, जो मेरे ताऊ लगते हैं. मेरे घर के ठीक सामने इनका घर है. पिताजी ने ताऊ जी को नौकरी दिलायी, नहीं कर पाये. उनके बड़े बेटे अशोक शुक्ल को नौकरी दिलायी, नहीं कर पाये. मंझले बेटे मनोज शुक्ल (अब इस दुनिया में नहीं) को नौकरी दिलायी, नहीं कर पाये. छोटे बेटे रामखेलावन उफॆ हवलदार को नौकरी दिलायी, जो आज भी कर रहा है. उसकी बदौलत ताऊजी का घर बना. घर बनाते समय किसी पंडित ने बताया कि जहां हमारा रास्ता है, वहां उनका घर बनता है. अब वह लगे गिड़गिड़ाने. इस पर एक समझौता हुआ कि घर के पीछे से हमें रास्ता देंगे और सामने वह मकान बनवा लें. उनका मकान बन गया, लेकिन पीछे जो पुराना मकान था, उसका एक कच्चा कमरा अब भी खड़ा है. बार-बार आग्रह और कुछ धन लेने के बावजूद अब तक उन्होंने रास्ता नहीं दिया. १६ अप्रैल को ताऊजी के पोते की शादी थी, जिसके लिए पिताजी हजारों रुपया खचॆ करके पहुंचे, टूर रास्ते में छोड़ कर. चार मई को गांव में रहनेवाले मेरे बड़े भाई विकास ने हवलदार को बुला कर एक बार फिर आग्रह किया कि रास्ते के लिए जगह छोड़ दें. बताते चलें कि मेरे घर तक साइकिल व मोटरसाइकिल जा सकती है, कोई अन्य वाहन नहीं. हां, तो भाई के आग्रह के बाद, पता नहीं किस भावना के वशीभूत होकर (भाई ने किसी तरह की जोरजबदॆस्ती की बात नहीं की) उन लोगों ने स्व. मनोज की पत्नी नीलम देवी के नाम से पुलिस अधीक्षक, गोंडा के यहां लिखित शिकायत कर दी कि विकास ने उन्हें गाली दी है. यहां एक बात और स्पष्ट कर दूं कि विकास भैया को गाली से भारी चिढ़ है. एक बार स्व. मनोज ने उन्हें गाली दी थी, तो उनका सिर फोड़ दिया था. अब आप लोग बतायें कि हम क्या करें. बता दूं कि जिस कंपनी में हवलदार काम करते हैं, पिताजी उसी में बड़े अधिकारी हैं. तो क्या हवलदार को नौकरी से चलता कर देना चाहिए???? यहां यह भी बता दूं कि यह महज एक उदाहरण है. हमने उस परिवार से हजारों गालियां खायी हैं. हमेशा उसने हमारे रास्ते में गड्ढा खोदा है, पर पिताजी की वजह से हमेशा बच गये. पिताजी का एक ही सिद्धांत रहा है कि हमारे कारण कोई दुखी या परेशान न हो. रात-बिरात जब भी जरूरत पड़ी हम उनके साथ रहे. आज उन्होंने ही भाई के खिलाफ एसपी से शिकायत की है. उनके घर में धन आने का एकमात्र रास्त हवलदार की नौकरी है. वहीं बंद करवा दें?????????? न रहेगा बांस, न रहेगी बांसुरी. जो काम आपस में बैठ कर समझ-बूझ कर बिना किसी विवाद के लिए हो सकता है, क्या अब उसके लिए हम अग्रेसिव होकर मुकदमा करें और अपना हक लेते हुए उस परिवार को बरबादी की कगार पर ढकेल दें. आप लोग क्या कहते हैं???????????? यह पोस्ट सिर्फ इसलिए कि आप बतायें, हम क्या करें? अब भी चुप रहें, तो कायरता होगी???????? कदम उठायें, तो एक परिवार बरबाद होता है?????????? फिर पत्रकार होते हुए जिस पुलिस को आज तक घास नहीं डाली, उसके सामने खड़े हों और ताऊजी की खिलाफत करें????????????इस पोस्ट का कतई मतलब नहीं कि मैं पिताजी या अपने परिवार की बड़ाई के लिए कुछ कह रहा हूं. इसका सिर्फ इतना मतलब है कि भड़ास नामक अपने परिवार से मुझे राय चाहिए, स्पष्ट कर दूं, राय चाहिए, मदद नहीं. अन्य के लिए हम काफी हैं. तो क्या है आप लोगों की राय? मामले की गंभीरता को समझते हुए उचित सलाह दें.

Thursday, May 8, 2008

किस काबिल हूं मैं

आज दोपहर में (हमारे लिये सुबह) घर से आफिस के लिए आ रहा था. रास्ते में एक जगह पर देखा कि एक अद्धॆविक्षिप्त सा युवक एक पूरी तरह से नग्न अधेड़ महिला (शायद उसकी मां रही होगी) को फुटपाथ से गोद में उठाने की कोशिश कर रहा था. कुछ सोच पाता इससे पहले नजर घड़ी पर पड़ गयी. दो बज कर बीस मिनट हो रहे थे और आफिस पहुंचने का टाइम दो बजे का है. काडॆ जो पंच करना होता है. बस उनके लिए कुछ करने की कौन कहे, सरपट आफिस के लिए भाग लिया. बस तभी से आत्मग्लानि से भरा हूं. आखिर वे भी तो इंसान थे. क्यों नहीं मैं उनके लिए कुछ कर पाया. भले ही वह महिला पागल रही हो, क्या मैं उसके लिए एक धोती नहीं खरीद सकता है, जबकि पान मसाला पर दिनभर में कम से कम तीस रुपये खचॆ होते हैं. यही सोच रहा हूं और दिल में रो रहा हूं. आखिर में लौटा और उसी स्थान पर गया, पर वे दोनों नहीं मिले. क्या करूं?????????????????????????

Sunday, April 13, 2008

सपना

सपना देखा करता था

जब छोटा था, सच्चा था

सपना देखा करता था

जब पढ़ता था, बच्चा था

सपने होते थे अजीबोगरीब

देश के विकास के

भ्रष्टाचार के विनाश के

नेताओं के सुधार के

और सपने होते थे

गांवों के विकास के

आजादी के, इतिहास के

सपने होते थे

गांधी के अरमानों के

भगत जैसे कुरबानों के

सपने होते थे

रानी झांसी मर्दाना के

और सपने होते थे

प्यार के, मुहब्बत के

भाईचारे के और और...और...और

सपने होते थे......

सारे सपने, सपने ही रह गये

भला खुली आंखों से देखा

सपना भी कभी पूरा हुआ

Thursday, April 10, 2008

सपने साकार होंगे

धर्मेंद्र भइया ने नया ब्लॉग बनाया, उसके लिए बधाई. नाम भी बड़ा अच्छा रखा है, सपने. बचपन से आज तक इन्होंने कई सपने देखे होंगे. यह उस तरह के लोगों में हैं, जो अपने सपनों को साकार करना जानते हैं. या यूं कहें कि इनमें वह माद्दा है कि अपने सपनों को साकार कर सकें. एक जूनियर के रूप में इनके साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखने का मौका मिला. उनमें एक चीज जो सबसे बढ़िया सीखी, वह यह कि कभी काम और सच के साथ समझौता नहीं करते. शायद यही कारण है कि उनके सपने साकार होते रहते हैं. सुख हो या दुख काम तो काम है. ब्लॉग के माध्यम से हमें और भी बहुत कुछ सिखाते रहेंगे. इसी कामना के साथ अभी बस इतना ही, आगे और भी...

Thursday, March 6, 2008

काम का आदमी

मन में बहुत कुछ है, पर लिखूं क्या यही समझ में नहीं आ रहा. दिल कहता है कि जीवन जैसे चल रहा है,चलने दो. दिमाग कहता है कि नहीं, फलाने तुम्हारे बाद इस लाइन में आया और आगे बढ़ गया और तुम वहीं के वहीं बैठे हो. आखिर कब तक समझौते पर समझौता करते जाओगे. और एक हम हैं कि काम से समझौता नहीं करते, करते हैं, तो दाम से. किसी ने कहा हम अभी इतना ही दे पायेंगे, तो सोचा चलो बाद में परफार्मेंस देखने के बाद सबकुछ ठीक हो जायेगा. पर नहीं होता है वही ढाक के तीन पात. कहीं कुछ नहीं. कोई तरक्की नहीं, परफार्मेंस को देखनेवाला कोई नहीं. लोगों (बॉस) को शायद लगता है कि इसके बारे में क्या सोचना, यह तो बेवकूफ है ही, जो भी दोगे ले लेगा और कुछ नहीं बोलेगा. और जब कम पैसे में काबिल (अपने आप को कह रहा हूं, अन्यथा न लें) आदमी मिल जाये, तो अधिक दाम देने की जरूरत ही क्या है. दो बार नौकरी बदली और दोनों बार यही अनुभव हुआ. कहीं सैलरी स्लिप न होने की सजा मिली, तो कहीं संबंधों की भेंट चढ़ गया. ऐसे और कितने दिन बिताओगे शुक्लाजी. बीवी मोबाइल मांग रही है, पर लायें कहां से जेब में तो किराया भी नहीं बचा. महीने का आखिर है, किसी तरह काम चल रहा है. खुद के पास भी एक महीने से मोबाइल नहीं है. एक समय था, जब घर में सबसे नया मोबाइल मेरे पास होता था. मां-बाप के पैसे को निर्दयतापूर्वक उड़ाता था, आज स्थितियां विकट हैं. एक-एक सिक्का खचॆ करने के पहले सोचना पड़ता है. उस पर तुर्रा यह कि अप्रैल के पहले हफ्ते या मई में बाप बननेवाला हूं. अस्पताल का खर्चा, फिर फंक्शन और जाने क्या-क्या. कम से कम ५० हजार रुपये चाहिए. हालांकि घर की बात करें, तो ऐसी कोई परेशानी नहीं है. पर अपना भी तो कुछ फर्ज बनता है. ६५ साल के पिताजी आज भी साल में छह महीने टूर पर रहते हैं, आखिर किसके लिए, हमारे लिए ही तो. और एक हम हैं कि उन्हें आजतक एक मोजा भी अपने पैसे से खरीद कर नहीं दिया. लानत है ऐसी नौकरी और बिना मतलब की ऐंठन पर. जिस तरह से सब नौकरी कर रहे हैं, मैं भी करता तो अब तक सब ठीक होता. मैं भी किसी ऊंची कुर्सी पर बैठ कर लंबा वेतन ऐंठ रहा होता, पर अपनी ही ऐंठन में मारा गया कि काम से समझौता नहीं करूंगा. लड़ जाता हूं, बॉस से सीनियर से या फिर जूनियर से कि अगर कोई काम बेहतर हो सकता था, तो हुआ क्यों नहीं. सब पागल समझते हैं, फिर भी कहते हैं काम का आदमी है. बस, काम का आदमी बन कर रह गया हूं.

Thursday, February 21, 2008

गालियां नहीं भड़ास हैं यह

भड़ास पर गालियों की चर्चा के दौरान मुझे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बिताये गये स्नातक की पढ़ाई के तीन साल याद आते हैं. एक तो मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी ऊपर से ठेठ लट्ठमार भाषा में बात करने का आदी. साथ ही उस जमाने में बीएचयू के कला संकाय को रंडुआ फैकल्टी (खुलेआम) कहा जाता था, (आज के बारे में नहीं जानता). हां तो मैं बता रहा था कि मैं भी उसी रंडुआ फैकल्टी का एक छात्र था. यह तो बताना भूल ही गया कि रंडुआ फैकल्टी इसलिए कहा जाता था कि स्नातक स्तर में कला संकाय में कोई छात्रा नहीं होती. एक-आध विभाग को छोड़ दें, तो किसी भी विभाग में कला संकाय में लड़कियों का दाखिला नहीं होता. केवल लगभग दो हजार लड़के ही होते हैं. हां, तो उस रंडुआ फैकल्टी में पढ़ते हुए आते-जाते किसी भी लड़की को भौजी (शादीशुदा हो अविवाहित) कह देना आम बात थी. यही नहीं रहता भी था बिड़ला छात्रावास. अब यशवंत भाई से पूछ लीजिएगा कि बिड़ला छात्रावास की पूरे बीएचयू ही नहीं पूरे बनारस में क्या छवि है. एक ऐसा हास्टल जिसमें रंडुआ फैकल्टी में पढ़नेवाले सभी रंडुए रहते थे. यही नहीं उनमें से कई हमेशा फ्रस्ट्रेट रहते थे कि उनकी कोई महिला मित्र नहीं है. ऐसे छात्र भला जुबान से सब कुछ कह और कर लेने से सिवा और क्या कर सकते थे. हॉस्टल के बगल से कोई छात्रा गुजरी नहीं कि शुरू हो गयी पैलगी... भौजी पांवलागूं, भौजी प्रणाम, भैया का का हाल है. और सब ठीक है न. कुछ ऐसे ही. हुआ कुछ यूं कि मेरे कुछ साथियों ने संगीत के डिप्लोमा पाठ्यक्रम में प्रवेश ले लिया और कुछ ही दिनों में उन्हें गर्लफ्रैंड भी मिल गयीं. ऐसी ही कुछ महिला मित्रों के साथ हॉस्टल के कई मित्र एक दिन बैठे थे. सभी अपनी-अपनी आवाज वायस रिकाडॆर में भर रहे थे. संयोग से मैं भी पहुंच गया. उनमें एक लड़की ऐसी थी, जो मुझे देख कर ही चिढ़ती थी या यूं कहें कि मेरी भाषा से चिढ़ती थी. (यशंवत जी भले ही संत कहें)बातचीत के दौरान गालियों की फुलझड़ियां छूटती थीं मेरे मुंह से. भला ऐसे में कौन लड़की मुंह लगाती. पर वह मुझे मुंह भी लगाती थी और जम कर बहस भी. बस उसकी एक ही शिकायत थी कि मुझे लड़कियों की कद्र करनी नहीं आती. मैं उन्हें सम्मान देना नहीं जानता. या मैं उन्हें भी अपने बराबर मानता हूं (वह हमेशा कहती थी कि तुम लड़कियों को अपने जैसा क्यों समझते हो). यहां बताता चलूं कि मैं शारीरिक बनावट के बजाय और किसी चीज में लड़कियों को किसी पुरुष से कम नहीं मानता और हर विषय पर उनसे खुल कर बात करता हूं. शायद कुछ ऐसा ही हम लोग भड़ास पर भी कर रहे हैं. मैंने पहले भी कहा था कि लोगों की नाराजगी जायज हो सकती है. वे अपनी भड़ास निकालें. या न झेल पायें, तो हमें मैला की तरह दरकिनार कर दें. कह दें ये वे मछलियां हैं, जो तालाब को गंदा करती हैं. पर मेरा एक सवाल भी है कि क्या केवल जुबान गंदी होने से कायनात में प्रलय आ जायेगी. अगर आ जाये, तो बेहतर ही है, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. जब दो तरह की बातें करनेवालों को कोई फर्क नहीं पड़ता है, तो हमें क्यों पड़े.मेरी बीएचयू वाली मित्र की तरह एक तरफ तो लड़कियों ( अपवादों को छोड़ कर)को बराबरी का दर्जा भी चाहिए और साथ ही में अबला या शालीन या लड़की या महिला या सभ्य या पता नहीं क्या-क्या होने का मुखौटा भी. यह ऐसा मुखौटा है, जिसके कारण लड़कियों को सीट और तथाकथित बौद्धिक लोगों को साहित्यिक कार्यक्रमों में आगे की सीट नसीब होती है. हमें यह सब नहीं चाहिए भाई. हम समाज सुधारक नहीं हैं. हमने समाज को सुधारने का ठेका नहीं लिया है.अरे जब हम अपने आप को आज तक नहीं सुधार पाये, तो समाज को क्या खाक सुधार पायेंगे. अब सवाल उठता है कि क्या है स्त्री मुक्ति? क्या तथाकथित सभ्यता के मुखौटे के पीछे छिपी बैठी हाड़-मांस की मूर्ति जिसे समाज की जंजीरों ने जकड़ या यूं कहें कि जिसने खुद को समाज की जंजीरों के पीछे सुरक्षित कर रहा है, को इसी तरह मुक्ति मिलेगी. नहीं, वर्जनाओं को तोड़ना होगा. मैं यह नहीं कहता है कि वे भी गरियाना शुरू कर दें. ऐसा कुछ भी नहीं है. गाली की वकालत मैं नहीं करता, लेकिन कम से कम हम पर वही बंदिशों न थोपी जायें, जिनके पीछे आधी दुनिया अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही, जिससे छुटकारा पाने की वह कोशिश कर रही है. नियम, सिद्धांत, तर्क, दर्शन और पता नहीं कितने बहानों के पीछे क्यों जा खड़ी होती है हमारी आबादी, प्रश्न यह है? प्रश्न यह भी है कि इन जंजीरों को अपने लिए बोझ, पुरुष मानसिकता और पता नहीं क्या-क्या बताने वाली आधी आबादी इनको उतार क्यों नहीं फेंकती. किस बात का डर है उसे? मुझे लगता है किसी बात का नहीं. उदाहरण हमारे सामने ही है. इसलिए स्त्री मुक्ति उनके खुद के हाथ में है. बराबरी का दर्जा मांगने से नहीं मिलेगा, मुक्ति मांगने से नहीं मिलेगी छीननी पड़ेगी. हमारी गालियों और भड़ास से किसी को डरने की जरूरत नहीं. मेरी मां के शब्दों में कह सकते हैं कि हम क्षणिक बुद्धि के लोग हैं यानी कि जो मन में आया बक दिया. बस यही सच्चाई है हमारी बातों के पीछे, जहां तक मुझे लगता है. अन्यथा मंच बहुत से हैं लिखने के. १२ घंटे अखबार के लिए कंप्यूटर में सिर खपाने के बाद इतनी ऊर्जा नहीं बचती कि हम कुछ और करें, फिर भी करते हैं, लिखते हैं. मन की भड़ास निकालते हैं, जिसके लिए यह मंच हैं. तरीका सबका अपना-अपना है. कोई गरिया कर निकालता है, तो कोई किसी और तरीके से. और जो लोग हमें सभ्य होने या गालियों से तौबा बरतने को कहते हैं, वह उनकी भड़ास ही तो है. इसलिए हम बुरा नहीं मानते. न ही सफाई देने की कोशिश करते हैं, बल्कि भड़ास के बदले एक और भड़ास निकलती है और रहेगी.बाकी फिरजय भड़ास

Wednesday, February 20, 2008

भड़ास और गालियाँ

भड़ास पर गालियों को लेकर एक बार फिर से बहस शुरू हो गयी है. भड़ास पर गालियां लिखी जायें या नहीं इस पर जम कर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. हम अपनी भड़ास गालियों के माध्यम से निकालें या नहीं यह भले ही बहस का मुद्दा बने, पर आम जीवन में यह बिल्कुल भी अस्वीकायॆ नहीं है. यहां मैं किसी साहित्यकार या रचनाकार का उदाहरण नहीं, बल्कि खुद एक चुटकुला या यूं कहें की लोकोक्ति के बारे में लिखना चाहूंगा, जो मेरे गृह जनपद गोंडा की शान बन गयी है. इसके पहले बताते चलें कि बनारस की तरह गोंडा में भी गालियों के बिना बात करना संभव ही नहीं है. मान लीजिए कोई अच्छा काम करता है, तो कहा जाता हैः वाह सार, बड़ा नीक काम किहिस हो. और अगर कुछ गड़बड़ हो गयी, तब तो ... कुछ इस अंदाज में प्रतिक्रियाएं मिलेंगी, मारो सारवा के.. बेटी...बड़ा ...है इत्यादि. हां तो बात कर रहा था लोकोक्ति की. हुआ कुछ यूं की एक बार एक सज्जन ट्रेन में यात्रा कर रहे थे. सामने वाली सीट पर बैठे सज्जन से बात शुरू हुई तो पता चला कि वह गोंडा के हैं. उन्होंने कहा, भाई साहब सुना है गोंडा के लोग बिना गाली दिये बात ही नहीं कर पाते हैं. इस पर सामने वाले सज्जन का जवाब था, कौन भोंसड़ी वाला मादर... कहता है? अब बताइये जो चीज हमारे दैनिक जीवन में बस गयी हो उससे कैसे बचा जाये. हालांकि लोगों के अपने-अपने विचार हो सकते हैं. और सही भी है, एक सभ्य समाज के लिए. पर हम इससे बच पायेंगे इसमें संदेह है. बिना गाली के भड़ास, तब तो भड़ास रह ही नहीं जाती. सक्षम हुए तो सामने, नहीं तो पीठ पीछे गरियायेंगे जरूर. हालांकि मेरी इस पोस्ट का कतई यह मतलब नहीं है कि मैं पूजा जी या नीलिमा जी या किसी और की खिलाफत कर रहा हूं. ऐसा भी नहीं है कि मैं उनकी नाराजगी के डर से ऐसा कह रहा हूं. पर...यह जो पर, लेकिन, किंतु, परंतु...इत्यादि शब्द हैं, न यह बहुत कुछ कह और समझा जाते हैं. आगे जय भड़ास