सोमवार, ९ नवम्बर २००९

किस मुद्दे पर लिखूं

मुद्दे बहुत हैं. लिखने का मन भी है. पर, किस मुद्दे पर लिखूं. प्रभाष जी का जाना है, तो मधु कोड़ा की लूट-खसोट. महंगाई है, तो दिल में लगी आग भी. अब यह मन भी है ना, इसका क्या करूं. बड़ा ही स्वार्थी हो रहा है. तो इसी की करता हूं. अक्तूबर २००७ में नियुक्ति मिली. बुला कर नियुक्ति दी गयी. तब से आज तक दो बार वेतन बढ़ा. सब ऊंट के मुंह में जीरे के समान. समझ में नहीं आता क्या करूं. सीनियर सब एडीटर हूं, पर काम करता हूं चीफ सब का. पेज वन का स्वतंत्र प्रभार है मेरे पास. कोशिश यही रहती है कि जितना आता है, उतना तो करूं ही, सीखूं, पढ़ूं, लोगों की राय लूं और काम सुधारूं. पिछले दिनों एक साथी ने कहा, संस्थान से नहीं, अपने काम से प्यार करो. उनकी बात अच्छी लगी. काम आता है. काम के लिए ही बुलाया गया, काम करता हूं. पर, अफसोस. आर्थिक मोर्चे पर केवल आश्वासन. पत्नी हैं,बेटी भी . कोलकाता जैसे महानगर में एक कमरे का मकान ही किराये पर लेने में एक चौथाई वेतन खत्म हो जाता है. उसमें बेटी का टीका, पत्नी की दवाएं और पता नहीं क्या-क्या. साल भर से गांव नहीं गया था. कारण आर्थिक तंगी. अक्तूबर में गांव तो हो आया. पर, अब क्या. मेल भेजा, बात की, फिर मिला आश्वासन. पिछली बार वेतन बढ़ा, तो आर्थिक मंदी थी. तब संपादकीय के मेरे स्तर के सहयोगियों में जिन लोगों के वेतन बढ़े उनमें सबसे अधिक वृद्धि पानेवालों में शायद मैं भी था. इस बार तो हद हो गयी. जूनियर सब एडीटर रैंक के सहयोगी का वेतन मुझसे अधिक बढ़ाया गया. मुझे थमा दिया गया झुनझुना. क्या करूं. सामने महीने में एलआइसी की किश्त देनी है. पत्नी और बेटी गांव से लौट रहे हैं. नौकरी छोड़ नहीं सकता. पर, मन में द्वंद्व लगातार चल रहा है. पंडित (जन्म से हूं, कर्म से नहीं) की आत्मा पीड़ित है. कोई कठोर कदम भी नहीं उठा सकता. अपनी पीड़ा अपने बनाये, अपने लिये बनाये ब्लॉग पर लिख रहा हूं. हां, अगर कोई और भी इसे पढ़े, तो इतना जरूर ध्यान रखना, जिंदगी के फैसले दिल से कभी नहीं लेने चाहिए. दिल के फैसले जज्बाती होते हैं. दिमाग चलाइए, अपने को पहचानिए. अपने काम की ताकत को पहचानिए. संस्थान से नहीं अपने काम से प्यार कीजिए. अर्थ सबकुछ नहीं, तो बहुत कुछ है. बाकी हम सब समझदार हैं.

मंगलवार, २१ जुलाई २००९

सिटी ऑफ ज्वॉय पर भीड़ की ममता, शक्ति प्रदर्शन का साधन बना शहीद दिवस

शहीद दिवस के नाम हर साल कोलकाता समेत पूरे राज्य में कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. पर ये कार्यक्रम हैं किसलिए, लोगों को परेशान करने, सिटी ऑफ ज्वाय की ऐसी-तैसी करने और किसलिए...राइटर्स अभियान के दौरान मारे गये कार्यकर्ताओं की याद में शहीद दिवस को इस बार दीदी ने ताकत प्रदर्शन का साधन बना दिया. इस मौके पर शहीदों को श्रद्धांजलि कम दी गयी, २०११ में होनेवाले बंगाल विधानसभा चुनाव के बारे में अधिक चर्चा की गयी. यही नहीं ममता दीदी ने तो २०११ विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल की जीत पक्की मान ली है. उन्होंने राइटर्स में बैठी तृणमूल सरकार की प्राथमिकताएं तक गिना डालीं. दूसरी ओर, बेचारी कोलकाता की निरीह जनता, उपनगरों से कोलकाता आनेवाले दैनिक यात्रियों की दुर्दशा पर दीदी ने केवल माफी मांग कर काम चला लिया. मंगलवार को कोलकाता की सड़कों व मेट्रो स्टेशन-ट्रेनों के साथ-साथ सभी दर्शनीय स्थलों पर दीदी की बातें सुनने राज्य भर से आये लोगों का कब्जा था. घर से दफ्तर पहुंचने में मुझे भी लगभग ३.५ घंटे लग गये, वह भी तब, जब मुख्य शहर में रहता हूं. फिर भी बस छोड़ कर लगभग तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, सड़क पर नहीं, सड़क के किनारे कीचड़ में. मजाल थी कि कोई भी सड़क पर कदम रखने की हिमाकत कर दे. हालात बिल्कुल वैसे ही, जैसे वाम मोरचा या माकपा की ब्रिगेड की किसी रैली का दृश्य.हालांकि मेरे समझ में अब भी यह नहीं आ रहा था कि दीदी को ताकत को प्रदर्शन करना ही था, तो शहीद दिवस ही क्यों??? वाम मोरचा और तृणमूल-कांग्रेस की इस ल‍ड़ाई से जनता को बाहर रखने के लिए छुट्टी वाला भी तो कोई दिन चुना जा सकता था. ऐसे में कम से कम दैनिक जनजीवन पर तो आफत नहीं आती, क्यों दीदी...है न...

बुधवार, ८ अप्रैल २००९

मुद्दों से भटकते हम

भई आजकल जूतों का बाजार गर्म है. ईराकी पत्रकार जैदी ने विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति पर जूता फेंका, तब से जूतों का भाव ही बढ़ गया है. फिर जूता फेंकने की कई और घटनाएं हुईं. और हालिया घटना हुई गृहमंत्री पी चिदंबरम की प्रेस कांफ्रेंस में. एक समय था जब किसी राज्य की विधानसभा में जूता-चप्पल फेंकने पर मीडिया के लोग (मैं भी) खूब हो-हल्ला मचाते थे. स्थिति कमोबेश आज भी कुछ वैसी ही है. हो-हल्ला खूब मचा. किसी ने जरनैल सिंह (बहुत ही वरिष्ठ हैं मुझसे) के पक्ष में, तो किसी ने उनके तरीके की खिलाफत की. मैं यहां न तो उनके पक्ष में और न ही खिलाफत में कुछ कहना चाहता हूं. मैं तो आत्ममंथन करना चाहता हूं, अपनी दशा और दिशा का. आज-कल कहीं न कहीं हम जैसे लोग ही पत्रकारिता की दशा और दिशा तय करते हैं. ऐसे में आत्ममंथन बहुत ही जरूरी हो जाता है. शुरुआत शुरू से करते हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए कोई जाता है, तो पहले दिन उसे सिखाया जाता है, कुत्ते ने आदमी को काटा, तो कोई खबर नहीं. आदमी ने कुत्ते को काटा, तो खबर बनती है. पर यहां एक सवाल उठता है कि अगर रोज-रोज आदमी कुत्ते को काटने लगे, तो कितनी बार खबर बनेगी. दूसरी बात मुद्दे की. जरनैल सिंह ने जूता फेंका, तो हर अखबार के पहले पन्ने पर, हर न्यूज चैनल पर २४ घंटे वही खबर चली. असल मुद्दा तो लोग भूल ही गये. श्री सिंह ने जूता नहीं फेंका होता, तो शायद उस दिन खबर कुछ और होती. कांग्रेस की शान में गृहमंत्री ने पढ़े कसीदे. या प्रेस कांफ्रेंस में चिदंबरम ने की यूपीए सरकार की वकालत...या ऐसे ही बहुत कुछ. पर बीच में आ गया जूता. और मौके पर उपस्थित हर पत्रकार, देश भर में टीवी से चिपके पत्रकार, शाम को अखबारों का पहला पन्ना बनानेवाले पत्रकार, सभी असल मुद्दे को भूल गये. गृहमंत्री ने क्या कहा, क्या नहीं...इस विषय से सब दूर हो गये. मौके पर लगायी गयी टीवी चैनलों की ओवी के कैमरे का रुख जरनैल सिंह की ओर हो गया. उन्हें थाने ले जाया गया, उससे पहले ही चैनलों और अखबारों के क्राइम बीट के संवाददाता थाने पहुंच गये. अटकलें लगाने लगे. एंकर और संवाददाताओं के बीच बातचीत में जरनैल सिंह की पीढ़ियों की कहानी का जिक्र होने लगा. चिदंबरम को लोग भूल गये. यह हुआ एक नमूना.दूसरा नमूना...हालांकि दूसरे नमूने से पहले हमें इस बात पर भी चिंतन करना चाहिए कि हमारी स्टोरी (न्यूज) का एंगल क्या होगा, इसका अंदाजा दूसरे लोग (जो मीडिया के नहीं हैं) कैसे लगा लेते हैं. अब आप पूछेंगे कैसे, तो बात जरा विस्तार में करते हैं. फिल्म प्रोड्यूसरों और मल्टीप्लेक्स मालिकों के बीच मुनाफे के बंटवारे को लेकर तनातनी चल रही है. प्रोड्यूसरों ने मल्टीप्लेक्स में फिल्में रिलीज करने से मना कर दिया है. इसी मुद्दे पर प्रोड्यूसरों ने प्रेस कांफ्रेंस बुलायी. उसमें शाहरूख और आमिर खान भी पहुंचे. बस हम भटक गये मुद्दे से. न हमें मल्टीप्लेक्स याद रहे. न ही याद रहीं फिल्में. मौके पर मौजूद अन्य प्रोड्यूसरों को भी हम भूल गये. उनकी बातों से कोई मतलब नहीं रहा. छुट्टियों के इस सीजन में फिल्में न रिलीज करने के प्रोड्यूसरों के फैसले के पीछे के कारणों को भी हम भूल गये. याद रहे, तो सिर्फ शाहरूख और आमिर. यानी की हम मुद्दे से भटक गये. हमने यह नहीं सोचा कि छुट्टियों में इस तरह के विवाद खड़े करने का फायदा प्रोड्यूसर इसलिए उठा रहे हैं, क्योंकि आइपीएल और आम चुनाव के चलते शायद ही कोई दर्शक सिनेमा हाल का रुख करेगा. ऐसे में फिल्में रिलीज हुईं, तो भी पिट जायेंगी. तो प्रोड्यूसरों ने (शायद) सोचा कि चलो इसी बहाने कुछ नया करते हैं. यह हुआ एक पहलू. दूसरा पहलू यह कि दूसरे हमारी स्टोरी का एंगल पहले जानते हैं, कैसे ???? ऐसे...शाहरुख ने प्रेस कांफ्रेंस में बार-बार कहा...आप लोग (संवाददाता) शायद मेरे और आमिर के एक मंच पर उपस्थित होने को बड़ी खबर बनायेंगे. हमारी दोस्ती के किस्से कहेंगे. पर हमारे मुद्दे को मत भूलियेगा. हमारे फिल्में न रिलीज करने के कारण को जरूर हाई लाइट कीजियेगा. और माफ कीजियेगा...हम शाहरुख की आशंका पर बिल्कुल खरे उतरे. हमने बड़े-बड़े अक्षरों में शाहरुख और आमिर के एक मंच पर उपस्थित होने की खबरें छापीं. हमने दोनों पर अलग से प्रोग्राम बनाये...पर मुद्दा, मुद्दा तो हम भूल ही गये. हमने वही किया, जिसकी आशंका शाहरूख को पहले से ही थी. यानी कहीं न कहीं, लोग हमारी मानसिकता को जान गये हैं, पहचान गये हैं. तो क्या अब हमें ऐसी मानसिकता को बदलने की जरूरत नहीं...? कुछ ऐसा करने की जरूरत नहीं, जिससे खबरों में रहने वाले लोग दूसरे दिन की हेडलाइन का अंदाजा पहले से न लगा लें...? जरूरत है चिंतन की...

मंगलवार, २७ जनवरी २००९

रियलिटी शो या टीवी का इमोशनल अत्याचार

अगर आप मुंबई महाराष्ट्र की वैशाली को बनाना चाहते हैं संगीत के विश्वयुद्ध का विजेता, तो उन्हें वोट देने के लिए टाइप करें...कोलकाता वेस्ट बंगाल की तोरषा सरकार को इंडियन आइडल बनाने के लिए वोट दें, टाइप करें...और ऐसे ही न जाने कितनी वोट अपील. अब तो आप लोग समझ ही गये होंगे, बात हो रही है आजकल टीवी पर चल रहे रियलिटी शोज की. इनमें डांस और गानों के शो की भरमार है. एक जमाना था, जब टीवी की दुनिया की बेताज बादशाह सास-बहुओं के माध्यम से लोगों पर इमोशनल अत्याचार कर रही थीं, आजकल ये रियलिटी शोज कर रहे हैं. और जिस तरह से ये लोग क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे हैं, वह राज ठाकरे की क्षेत्रीयता की भावना से कुछ कम नहीं है. यानी टीवी और फिल्मों के गढ़ मुंबई में रहनेवाले इन लोगों पर भी राज ठाकरे का पूरा-पूरा प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहा है.कोई माने या न माने, जिस तरह से वोट के नाम पर ये लोग क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे हैं, वह किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता. हाल ही में जी टीवी का सारेगामापा चैलेंज जीतनेवाली वैशाली की कहानी भी कुछ इसी तरह की है. मैं किसी भी तरह से वैशाली के टैलेंट पर कोई प्रश्न नहीं उठा रहा. पर सवाल उठता है कि जिस तरह से बार-बार वैशाली के गुरु हिमेश रेशमिया ने अपनी बातों से लोगों की भावनाएं भड़कायीं, क्या वह उचित था? फिर संगीत जैसे शो पर उसी प्रांत विशेष के नेताओं को लेकर स्थानीय प्रतिभागियों के लिए वोट की अपील करना, कहां तक न्यायसंगत है. जब पूरे देश ही नहीं विदेश की जनता शो देख रही है, तो वोट की अपील केवल महाराष्ट्र और बंगाल के लोगों से ही क्यों? क्यों नहीं कहा जाता कि भारत की वैशाली को जिताने के लिए वोट करें या भारत के सोमेन और तोरषा अच्छा गाते हैं, तो उन्हें जितायें. बार-बार बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब इत्यादि प्रदेशों के नाम लेकर क्या जताने चाहते हैं ये शोज के एंकर. टीआरपी की अंधी दौड़ में ये लोग क्यों भूल जाते हैं कि टीवी देख रही मासूम जनता पर इनकी बातों का कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. क्यों लोगों की भावनाएं भड़काने की बार-बार कोशिश की जाती है. और अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो क्यों न इस तरह के शोज पर प्रतिबंध लगा दिया जाये. जब राज ठाकरे बिहार-उत्तरप्रदेश के लोगों के खिलाफ कुछ बोलते हैं, तो उनके खिलाफ भावनाएं भड़काने का मुकदमा होता है, तो इन शोज के कर्ता-धर्ताओं के खिलाफ क्यों नहीं??? आखिर हम सब राज्य और क्षेत्रीयता की भावना से ऊपर उठ कर कब भारतीय बनेंगे. आजादी के इतने सालों बाद भी हम नहीं चेते, तो अनर्थ निश्चित है. तो अब टीवी के माध्यम से किये जा रहे इमोशनल अत्याचार पर कब लगेगी रोक

आदरणीय यशवंत जी

आप अकसर कहा करते थे, विशाल तो एकदम संत है. याद है... आज मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं. अच्छी तरह से जानता हूं कि मेरी बातों में वास्तविकता कम और भावुकता का मिश्रण ज्यादा है. फिर भी सोचा उस शख्स को पत्र लिखा जाये, जिसने संत की उपाधि से नवाजा. मेरा पत्रकारिता का जीवन कोलकाता और कानपुर के बीच सिमटा रहा. आपके पास रिज्यूम भेजा था, तब बेकार चल रहा था. याद है, आपने आइनेक्सट में जूनियर सब एडीटर के रूप में काम दिया था. बाद में आपके चले जाने के बाद जहां से आया था, वहीं लौट गया. अब पत्रकारिता जीवन के पांच बसंत से ज्यादा हो गये हैं. इस दौरान क्या मिला, यह कभी सोचा नहीं और क्या खोया इसे सोचने की कभी फुर्सत नहीं मिली. आपको याद है न एक बार तत्कालीन संपादकजी ने कुछ अपशब्द कहे थे, तो क्या सि्थति हुई थी, मेरी. आज भी बिलकुल वैसा ही हूं. कहीं कोई बदलाव नहीं. सिर्फ एक बदलाव आया है कि एक बिटिया का बाप हो गया हूं. इसके बावजूद इस पेशे से कभी बहुत पाने की चाह नहीं रही और अब तो एकदम निराश हो गया हूं. कारण है इस पेशे में कभी नौकरी करने नहीं आया. आया था कुछ करने, पर किया क्या, कुछ नहीं. अब जब उन नामों को छटनी की सूची में देखता हूं, जिन्हें पढ़-पढ़ कर यहां तक पहुंचा, तो सोचता हूं कि क्या इस जीवन की यही नियति है...जिन्होंने अपने-अपने संस्थानों पर जीवन के अमूल्य क्षण न्योछावर कर दिये, उनसे ही संस्थानों ने किनारा कर लिया, तो फिर हम जैसे लोगों की बिसात ही क्या है. सारी निष्ठा और पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया जाता है. कहा जाता है अखबार आंदोलन नहीं करते. ठीक है. मानता हूं. अखबार उत्पाद बन गये हैं, यह भी मानता हूं. आपको अब उस उत्पाद को सफलता के शिखर पर ले जानेवालों की जरूरत नहीं, यह भी मानता हूं. पर जिस तरह से आप उन्हें लात मार रहे हैं, उस तरीके को मानने से इनकार करता हूं. आप (प्रबंधन, संपादक) उन्हें जिस गरिमा से संस्थान में लाये थे, उसी गरिमा के साथ साफ-साफ कहिए, संस्थान को आपकी जरूरत नहीं. यह भी तब कहिए, जब आपको लगे कि इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा. पर नहीं, आप लोगों को तो आंख की किरकिरी बने लोगों को रास्ते से हटाना है. तो भी सच बोल कर हटाइये, यूं बहाने तो मत बनाइये. अब तो बस निराशा बढ़ती जा रही है. कोई जानकार इस क्षेत्र में आने की सोचता है, तो उस पर चिल्ला उठता हूं, कोई और नौकरी नहीं है, संसार में जो पत्रकार बनने चले हो...निराश और हतोत्साहित युवा पीढ़ी, किस तरह नये समाज का निर्माण करेगी, कभी सोचिएगा और जवाब मिले तो मुझे भी जरूर बताइएगा.
आपका
संत

बुधवार, १४ जनवरी २००९

उदासी

जिंदगी चलते-चलते अचानक ठहर सी जाती है,
तब देखता हूं अपनी ही आंखों में उदासी है।
जिन आंखों में डूबकर लिखता था किस्सा मुहब्बत का,
उन आंखों के कतरों की उदासी भी तो प्यासी है।
तेरी शबनम सी आंहों पर बदल बैठा ये दिल मेरा,
तेरे आगोश में रहकर मचल बैठा ये दिल मेरा।
तेरी एक भूख ने बदल दी तस्वीर ये कैसी है,
जलन दिल की तब जैसी थी, ये वैसी थी ये वैसी है.
मैं हंसता हूं, न रोता हूं मेरी तकदीर कैसी है,
झपट कर फाड़ दी हो जैसे ये तसवीर वैसी है।
तेरे मासूम गुनाहों की सजा, किसी को दे नहीं सकता,
मेरे पागल दिल भला मैं तुझको खो नहीं सकता.

मंगलवार, २३ दिसम्बर २००८

यह कथा है टीवी की, बीवी की, वोटों की नोटों की...

टीवी वाले भी जब भी मर्जी कुछ भी दिखाने लगते हैं. हाल के दिनों में टीवी चैनलों के टैलेंट हंट शोज ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी है. क्या करें मामला टीवी और बीवी का जो ठहरा. रात में घर पहुंचे और न्यूज चैनल देखने की कोशिश करो, तो बीवी टीवी का रिमोट छीन कर उस चैनल पर लगा देती हैं, जिस पर आ रहा होता है टैलेंट हंट शो. यहां सबकुछ होता है, जो पहले सास-बहू छाप ड्रामों में हुआ करता था. रोना-गाना-नाचना और भी बहुत कुछ. एक प्रतिभागी का दूसरे से चल रहा चक्कर तो एंकर सबके बीच में बना हुआ घनचक्कर. फिर बारी आती है वोट मांगने की. नेताओं की तरह ये प्रतिभागी भी मुझ जैसी निरीह जनता से एसएमएस से वोट मांगते हैं. वे तो मांगते हैं वोट और मेरे मोबाइल के घटते हैं नोट. एक-एक वोट की लागत तीन रुपये से कम तो किसी भी हालत में नहीं होती. अब बीवी को कौन बताये कि मेरे मोबाइल से एक रुपये में एसटीडी कॉल हो सकती है, तो फिर एक एसएमएस के लिए तीन रुपये खर्च करने में जान निकल जाती है. पर क्या करें, जब आज तक बड़े-बड़े दिग्गज बीवी के खिलाफ मुंह नहीं खोल पाये, तो मेरी मजाल ही क्या है. खैर जो भी हो मेरी तो जेब ढीली हो ही रही है. कल मेरे एक मित्र पूछने लगे, आपको टैलेंट हंट शोज के बारे में इतनी जानकारी कैसे रहती है. अब मैं उन्हें क्या बताता कि रात भर टीवी पर यही सब देखना मेरी उन सजाओं में शामिल है, जो बीवी ने मेरे लिए तजबीज की होती है. बात कर रहे थे टैलेंट हंट शोज की. यहां भी किसी भी हालत में टैलेंट का हंट तो दिखायी नहीं देता. कुछ दिखता है, तो केवल नौटंकी. लगातार गिरते स्तर के बीच स्तरीय गायक बाहर होते जा रहे हैं औऱ स्तरहीन लोगों को वोट मिल रहे हैं. जय हो भारत की जनता की. शायद इसे लगता है कि वोटों का अधिकार केवल स्तरहीन लोगों का होता है. आज तक एक भी ईमानदार नेता चुनाव में जीता है, जो एक भी बढ़िया गायक टैलेंट हंट शो में जीत दर्ज करा सके. एक शो आता है इंडियन आइडल-४. पिछले तीन हफ्तों में लगातार तीन लड़कियों बनारस की अनन्या मिश्रा, दिल्ली की तुलिका गांगुली और ग्वालियर की शीनी कलविंत को जनता ने वोट आउट कर उनके शहर लौटा दिया. ठीक है भाई इन लड़कियों में टैलेंट जो था. फिर हम लोगों को टैलेंट की जरूरत थोड़े है. हमें तो नौटंकी की जरूरत है. जो बाकी बचे हैं, उनमें से टैलेंटेड लोग धीरे-धीरे निकलते जायेंगे और नौटंकीबाज की चांदी रहेगी. और अंत में जीतेगा सबसे बड़ा नौटंकीबाज ही. दूसरी बात, इंडियन आइडल के निर्णायकों की एक तमन्ना पिछले चार सालों से पूरी नहीं हो रही है. वे चाहते हैं कि कोई लड़की इंडियन आइडल का खिताब जीते. अब हम आपको क्या बतायें सोनाली जी, अनु जी, कैलाश जी और जावेद साहब. यह हमारा देश है. सोनाली जी ठीक कहती हैं हम अब भी नहीं बदले. भला लड़कियों को हम ऊंचे मुकाम तक कैसे जाने दे सकते हैं. आज तक ऐसा कभी हमने होने दिया है, जो आज होने देंगे. किरण बेदी को हमने दिल्ली का पुलिस कमिश्नर नहीं बनने दिया, भले ही वह टैलेंटेड और सीनियर थीं. तो फिर इन लड़कियों की क्या मजाल जो इंडियन आइडल बन पायें. सो सोनाली जी अपने सपने को सपने में ही पूरा होते देखिये. हकीकत दूर की बात है.